Showing posts with label दुष्यंत कुमार (Dushyant Kumar). Show all posts
Showing posts with label दुष्यंत कुमार (Dushyant Kumar). Show all posts

Monday, May 30, 2011

एक आशीर्वाद (Ek Ashirvad) - दुष्यंत कुमार (Dushyant Kumar)

जा तेरे स्वप्न बड़े हों।
भावना की गोद से उतर कर
जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।
चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये
रूठना मचलना सीखें।
हँसें
मुस्कुराऐं
गाऐं।
हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें
उँगली जलायें।
अपने पाँव पर खड़े हों।
जा तेरे स्वप्न बड़े हों।

Sunday, January 23, 2011

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे (Mere Swapn Tumhare Pas Sahara Pane Aayenge) - दुष्यंत कुमार (Dushyant Kumar)

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे
इस बूढे पीपल की छाया में सुस्ताने आयेंगे


हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेडो मत

हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आयेंगे


थोडी आँच बची रहने दो थोडा धुँआ निकलने दो

तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आयेंगे


उनको क्या मालूम निरूपित इस सिकता पर क्या बीती

वे आये तो यहाँ शंख सीपियाँ उठाने आयेंगे


फिर अतीत के चक्रवात में दृष्टि न उलझा लेना तुम

अनगिन झोंके उन घटनाओं को दोहराने आयेंगे


रह-रह आँखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी

आगे और बढे तो शायद दृश्य सुहाने आयेंगे

मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता

हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आयेंगे


हम क्यों बोलें इस आँधी में कई घरौंदे टूट गये

इन असफल निर्मितियों के शव कल पहचाने जयेंगे


हम इतिहास नहीं रच पाये इस पीडा में दहते है

अब जो धारायें पकडेंगे इसी मुहाने आयेंगे

Monday, October 25, 2010

आग जलती रहे (Aag Jalti Rahe) - दुष्यंत कुमार (Dushyant Kumar)

एक तीखी आँच ने

इस जन्म का हर पल छुआ,

आता हुआ दिन छुआ

हाथों से गुजरता कल छुआ

हर बीज, अँकुआ, पेड़-पौधा,

फूल-पत्ती, फल छुआ

जो मुझे छूने चली

हर उस हवा का आँचल छुआ

... प्रहर कोई भी नहीं बीता अछूता

आग के संपर्क से

दिवस, मासों और वर्षों के कड़ाहों में

मैं उबलता रहा पानी-सा

परे हर तर्क से

एक चौथाई उमर

यों खौलते बीती बिना अवकाश

सुख कहाँ

यों भाप बन-बन कर चुका,

रीता, भटकता

छानता आकाश

आह! कैसा कठिन

... कैसा पोच मेरा भाग!

आग चारों और मेरे

आग केवल भाग!

सुख नहीं यों खौलने में सुख नहीं कोई,

पर अभी जागी नहीं वह चेतना सोई,

वह, समय की प्रतीक्षा में है, जगेगी आप

ज्यों कि लहराती हुई ढकने उठाती भाप!

अभी तो यह आग जलती रहे, जलती रहे

जिंदगी यों ही कड़ाहों में उबलती रहे ।

Monday, September 13, 2010

फिर कर लेने दो प्यार प्रिये ( Phir Kar Lene Do Pyaar Priye) - दुष्यंत कुमार ( Dushyant Kumar)

अब अंतर में अवसाद नहीं
चापल्य नहीं उन्माद नहीं
सूना-सूना सा जीवन है
कुछ शोक नहीं आल्हाद नहीं

तव स्वागत हित हिलता रहता
अंतरवीणा का तार प्रिये ..

इच्छाएँ मुझको लूट चुकी
आशाएं मुझसे छूट चुकी
सुख की सुन्दर-सुन्दर लड़ियाँ
मेरे हाथों से टूट चुकी

खो बैठा अपने हाथों ही
मैं अपना कोष अपार प्रिये
फिर कर लेने दो प्यार प्रिये ..