Showing posts with label मलिक मोहम्मद जायसी (Malik Mohammed Jayasi). Show all posts
Showing posts with label मलिक मोहम्मद जायसी (Malik Mohammed Jayasi). Show all posts

Thursday, November 4, 2010

पद्मावती-नागमती-सती-खंड - पद्मावत (Padmavati - Nagmati - Sati Khand - Padmavat )मलिक मोहम्मद जायसी (Malik Mohammed Jayasi)

पदमावति पुनि पहिरि पटोरी । चली साथ पिउ के होइ जोरी ॥
सूरुज छपा, रैनि होइ गई । पूनो-ससि सो अमावस भई ॥
छोरे केस, मोति लर छूटीं । जानहुँ रैनि नखत सब टूटीं ॥
सेंदुर परा जो सीस अघारा । आगि लागि चह जग अँधियारा ॥
यही दिवस हौं चाहति, नाहा । चलौं साथ, पिउ ! देइ गलबाहाँ ॥
सारस पंखि न जियै निनारे । हौं तुम्ह बिनु का जिऔं, पियारे ॥
नेवछावरि कै तन छहरावौं । छार होउँ सँग, बहुरि न आवौं ॥

दीपक प्रीति पतँग जेउँ जनम निबाह करेउँ ।
नेवछावरि चहुँ पास होइ कंठ लागि जिउ देउँ ॥1॥

नागमती पदमावति रानी । दुवौ महा सत सती बखानी ॥
दुवौ सवति चढि खाट बईठीं । औ सिवलोक परा तिन्ह दीठी ॥
बैठौ कोइ राज औ पाटा । अंत सबै बैठे पुनि खाटा ॥
चंदन अगर काठ सर साजा । औ गति देइ चले लेइ राजा ॥
बाजन बाजहिं होइ अगूता । दुवौ कंत लेइ चाहहिं सूता ॥
एक जो बाजा भएउ बियाहू । अब दुसरे होइ ओर-निबाहू ॥
जियत जो जरै कंत के आसा । मुएँ रहसि बैठे एक पासा ॥

आजु सूर दिन अथवा, आजु रेनि ससि बूड ।
आजु नाचि जिउ दीजिय, आजु आगि हम्ह जूड ॥2॥

सर रचि दान पुन्नि बहु कीन्हा । सात बार फिरि भाँवरि लीन्हा ॥
एक जो भाँवरि भईं बियाही । अब दुसरे होइ गोहन जाहीं ॥
जियत, कंत ! तुम हम्ह गर लाई । मुए कंठ नहिं छोडँहिं,साईं !
औ जो गाँठि, कंत ! तुम्ह जोरी । आदि अंत लहि जाइ न छोरी ।
यह जग काह जो अछहि न आथी । हम तुम, नाह ! दुहुँ जग साथी ॥
लेइ सर ऊपर खाट बिछाई । पौंढी दुवौ कंत गर लाई ॥
लागीं कंठ आगि देइ होरी । छार भईं जरि, अंग न मोरी ॥

रातीं पिउ के नेह गइँ, सरग भएउ रतनार ।
जो रे उवा , सो अथवा; रहा न कोइ संसार ॥3॥

वै सहगवन भईं जब जाई । बादसाह गड छेंका आई ॥
तौ लगि सो अवसर होइ बीता । भए अलोप राम औ सीता ॥
आइ साह जो सुना अखारा । होइगा राति दिवस उजियारा ॥
छार उठाइ लीन्ह एक मूठी । दीन्ह उडाइ, पिरथिमी झूठी ॥
सगरिउ कटक उठाई माटी । पुल बाँधा जहँ जहँ गढ-घाटी ॥
जौ लहि ऊपर छार न परै । तौ लहि यह तिस्ना नहिं मरै ॥
भा धावा, भइ जूझ असूझा । बादल आइ पँवरि पर जूझा ॥

जौहर भइ सब इस्तरी, पुरुष भए संग्राम ।
बादसाह गढ चूरा, चितउर भा इसलाम ॥4॥


(1) आगि लागि ...अँधियार = काले बालों के बीच लाल सिंदूर मानो यह सूचित करता था कि अँधेरे संसार में आग लगा चाहती है ।छहराऊँ =छितराऊँ ।

(2) महासत = सत्य में तिन्ह दीठि परा = उन्हें दिखाई पडा । बैठी चाहे बैठे । खाटा = अर्थी, टिकठी । अगूता होइ = आगे होकर । सूता चहहिं = सोना चाहती हैं । बाजा = बाजे से । ओर निबाहू = अंत का निर्वाह । रहसि = प्रसन्न होकर । बूड = डूबा । हम्ह = हमें हमारे लिये । जूड = ठंढी ।

(3) सर = चिता । गोहन =साथ । हम्ह गर लाई = हमें गले लगाया । अंत लहि = अंत तक । अछहि = है । आथी = सार; पूँजी, अस्तित्व । अछहि न आथी । जो स्थिर या सारवान् नहीं रतनार = लाल, प्रेममय या आभापूर्ण

(4) सहगवन भईं = पति के साथ सहगमन किया, सती हुई । तौ लगि...बीता = तब तक तो वहाँ सब कुछ हो चुका था । अखारा = अखाडे । या सभा में,दरबार में । गढ घाटी = गढ की खाईं । पुल बाँधा...घाटी = सती स्त्रियों एक मुट्ठी राख इतनी हो गई कि उसने जगह जगह खाईं पट गई और पुल सा बँध गया । जौ लहि = जबतक । तिस्ना = तृष्णा । जौहर भइँ = राजपूत प्रथा के अनुसार जल मरीं । संग्राम भए = खेत रहे, लडकर मरे । चितउर भा इसलाम = चित्तौरगढ में भी मुसलमानी अमलदारी हो गई ।