Sunday, September 12, 2010

चेतक की वीरता ( Chetak Ki Veerta) - श्यामनारायण पाण्डेय (Shyamnarayan Pandey)

Special thanks to Raj Gurjar because of whom we have the complete poem. 

बकरों से बाघ लड़े¸
भिड़ गये सिंह मृग–छौनों से।
घोड़े गिर पड़े गिरे हाथी¸
पैदल बिछ गये बिछौनों से।।1।।

हाथी से हाथी जूझ पड़े¸
भिड़ गये सवार सवारों से।
घोड़ों पर घोड़े टूट पड़े¸
तलवार लड़ी तलवारों से।।2।।

हय–रूण्ड गिरे¸ गज–मुण्ड गिरे¸
कट–कट अवनी पर शुण्ड गिरे।
लड़ते–लड़ते अरि झुण्ड गिरे¸
भू पर हय विकल बितुण्ड गिरे।।3।।

क्षण महाप्रलय की बिजली सी¸
तलवार हाथ की तड़प–तड़प।
हय–गज–रथ–पैदल भगा भगा¸
लेती थी बैरी वीर हड़प।।4।।

क्षण पेट फट गया घोड़े का¸
हो गया पतन कर कोड़े का।
भू पर सातंक सवार गिरा¸
क्षण पता न था हय–जोड़े का।।5।।

चिंग्घाड़ भगा भय से हाथी¸
लेकर अंकुश पिलवान गिरा।
झटका लग गया¸ फटी झालर¸
हौदा गिर गया¸ निशान गिरा।।6।।

कोई नत–मुख बेजान गिरा¸
करवट कोई उत्तान गिरा।
रण–बीच अमित भीषणता से¸
लड़ते–लड़ते बलवान गिरा।।7।।

होती थी भीषण मार–काट¸
अतिशय रण से छाया था भय।
था हार–जीत का पता नहीं¸
क्षण इधर विजय क्षण उधर विजय।।8
 

कोई व्याकुल भर आह रहा¸
कोई था विकल कराह रहा।
लोहू से लथपथ लोथों पर¸
कोई चिल्ला अल्लाह रहा।।9।।

धड़ कहीं पड़ा¸ सिर कहीं पड़ा¸
कुछ भी उनकी पहचान नहीं।
शोणित का ऐसा वेग बढ़ा¸
मुरदे बह गये निशान नहीं।।10।।


मेवाड़–केसरी देख रहा¸
केवल रण का न तमाशा था।
वह दौड़–दौड़ करता था रण¸
वह मान–रक्त का प्यासा था।।11।।

चढ़कर चेतक पर घूम–घूम
करता मेना–रखवाली था।
ले महा मृत्यु को साथ–साथ¸
मानो प्रत्यक्ष कपाली था।।12।।

रण–बीच चौकड़ी भर–भरकर
चेतक बन गया निराला था।
राणा प्रताप के घोड़े से¸
पड़ गया हवा को पाला था।।13।।

गिरता न कभी चेतक–तन पर¸
राणा प्रताप का कोड़ा था।
वह दोड़ रहा अरि–मस्तक पर¸
या आसमान पर घोड़ा था।।14।।

जो तनिक हवा से बाग हिली¸
लेकर सवार उड़ जाता था।
राणा की पुतली फिरी नहीं¸
तब तक चेतक मुड़ जाता था।।15।।

कौशल दिखलाया चालों में¸
उड़ गया भयानक भालों में।
निभीर्क गया वह ढालों में¸
सरपट दौड़ा करवालों में।।16।।

है यहीं रहा¸ अब यहां नहीं¸
वह वहीं रहा है वहां नहीं।
थी जगह न कोई जहां नहीं¸
किस अरि–मस्तक पर कहां नहीं।।17।

बढ़ते नद–सा वह लहर गया¸
वह गया गया फिर ठहर गया।
विकराल ब्रज–मय बादल–सा
अरि की सेना पर घहर गया।।18।।

भाला गिर गया¸ गिरा निषंग¸
हय–टापों से खन गया अंग।
वैरी–समाज रह गया दंग
घोड़े का ऐसा देख रंग।।19।।

चढ़ चेतक पर तलवार उठा
रखता था भूतल–पानी को।
राणा प्रताप सिर काट–काट
करता था सफल जवानी को।।20।।

कलकल बहती थी रण–गंगा
अरि–दल को डूब नहाने को।
तलवार वीर की नाव बनी
चटपट उस पार लगाने को।।21।।

वैरी–दल को ललकार गिरी¸
वह नागिन–सी फुफकार गिरी।
था शोर मौत से बचो¸बचो¸
तलवार गिरी¸ तलवार गिरी।।22।।

पैदल से हय–दल गज–दल में
छिप–छप करती वह विकल गई!
क्षण कहां गई कुछ¸ पता न फिर¸
देखो चमचम वह निकल गई।।23।।

क्षण इधर गई¸ क्षण उधर गई¸
क्षण चढ़ी बाढ़–सी उतर गई।
था प्रलय¸ चमकती जिधर गई¸
क्षण शोर हो गया किधर गई।।24।।

क्या अजब विषैली नागिन थी¸
जिसके डसने में लहर नहीं।
उतरी तन से मिट गये वीर¸
फैला शरीर में जहर नहीं।।25।।

थी छुरी कहीं¸ तलवार कहीं¸
वह बरछी–असि खरधार कहीं।
वह आग कहीं अंगार कहीं¸
बिजली थी कहीं कटार कहीं।।26।।

लहराती थी सिर काट–काट¸
बल खाती थी भू पाट–पाट।
बिखराती अवयव बाट–बाट
तनती थी लोहू चाट–चाट।।27।।

सेना–नायक राणा के भी
रण देख–देखकर चाह भरे।
मेवाड़–सिपाही लड़ते थे
दूने–तिगुने उत्साह भरे।।28।।

क्षण मार दिया कर कोड़े से
रण किया उतर कर घोड़े से।
राणा रण–कौशल दिखा दिया
चढ़ गया उतर कर घोड़े से।।29।।

क्षण भीषण हलचल मचा–मचा
राणा–कर की तलवार बढ़ी।
था शोर रक्त पीने को यह
रण–चण्डी जीभ पसार बढ़ी।।30।। 
वह हाथी–दल पर टूट पड़ा¸
मानो उस पर पवि छूट पड़ा।
कट गई वेग से भू¸ ऐसा
शोणित का नाला फूट पड़ा।।31।।

जो साहस कर बढ़ता उसको
केवल कटाक्ष से टोक दिया।
जो वीर बना नभ–बीच फेंक¸
बरछे पर उसको रोक दिया।।32।।

क्षण उछल गया अरि घोड़े पर¸
क्षण लड़ा सो गया घोड़े पर।
वैरी–दल से लड़ते–लड़ते
क्षण खड़ा हो गया घोड़े पर।।33।।

क्षण भर में गिरते रूण्डों से
मदमस्त गजों के झुण्डों से¸
घोड़ों से विकल वितुण्डों से¸
पट गई भूमि नर–मुण्डों से।।34।।

ऐसा रण राणा करता था
पर उसको था संतोष नहीं
क्षण–क्षण आगे बढ़ता था वह
पर कम होता था रोष नहीं।।35।।

कहता था लड़ता मान कहां
मैं कर लूं रक्त–स्नान कहां।
जिस पर तय विजय हमारी है
वह मुगलों का अभिमान कहां।।36।।

भाला कहता था मान कहां¸
घोड़ा कहता था मान कहां?
राणा की लोहित आंखों से
रव निकल रहा था मान कहां।।37।।

लड़ता अकबर सुल्तान कहां¸
वह कुल–कलंक है मान कहां?
राणा कहता था बार–बार
मैं करूं शत्रु–बलिदान कहां?।।38।।

तब तक प्रताप ने देख लिया
लड़ रहा मान था हाथी पर।
अकबर का चंचल साभिमान
उड़ता निशान था हाथी पर।।39।।

वह विजय–मन्त्र था पढ़ा रहा¸
अपने दल को था बढ़ा रहा।
वह भीषण समर–भवानी को
पग–पग पर बलि था चढ़ा रहा।।40।

फिर रक्त देह का उबल उठा
जल उठा क्रोध की ज्वाला से।
घोड़ा से कहा बढ़ो आगे¸
बढ़ चलो कहा निज भाला से।।41।।

हय–नस नस में बिजली दौड़ी¸
राणा का घोड़ा लहर उठा।
शत–शत बिजली की आग लिये
वह प्रलय–मेघ–सा घहर उठा।।42।।

क्षय अमिट रोग¸ वह राजरोग¸
ज्वर सiन्नपात लकवा था वह।
था शोर बचो घोड़ा–रण से
कहता हय कौन¸ हवा था वह।।43।।

तनकर भाला भी बोल उठा
राणा मुझको विश्राम न दे।
बैरी का मुझसे हृदय गोभ
तू मुझे तनिक आराम न दे।।44।।

खाकर अरि–मस्तक जीने दे¸
बैरी–उर–माला सीने दे।
मुझको शोणित की प्यास लगी
बढ़ने दे¸ शोणित पीने दे।।45।।

मुरदों का ढेर लगा दूं मैं¸
अरि–सिंहासन थहरा दूं मैं।
राणा मुझको आज्ञा दे दे
शोणित सागर लहरा दूं मैं।।46।।

रंचक राणा ने देर न की¸
घोड़ा बढ़ आया हाथी पर।
वैरी–दल का सिर काट–काट
राणा चढ़ आया हाथी पर।।47।।

गिरि की चोटी पर चढ़कर
किरणों निहारती लाशें¸
जिनमें कुछ तो मुरदे थे¸
कुछ की चलती थी सांसें।।48।।

वे देख–देख कर उनको
मुरझाती जाती पल–पल।
होता था स्वर्णिम नभ पर
पक्षी–क्रन्दन का कल–कल।।49।।

मुख छिपा लिया सूरज ने
जब रोक न सका रूलाई।
सावन की अन्धी रजनी
वारिद–मिस रोती आई।।50।। 

54 comments:

  1. Replies
    1. Ati sunder......
      Thanks for this awesome composition :)

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  2. itni bakwaas poem life main nahi padhi

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    1. dhes ko apna mano to is poem ka mtlb smjh aaega

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    2. What do you know of poetry and what can you understand about courage and history. Chetak was a horse of unparalleled fame, courage, speed, intelligence and sacrifice. This poetry has awakened the blood of many a youngster boy during his childhood. So to call it bakwaas is a shame. This poetry quoted here is just a shortened version.

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    3. nishu you should go and die why you even alive...what do you know about our history and bravery embedded in it...this poem is an excellent example of hindi signifying unparalleled unsung brove history of maharana pratap and his horse...if they wouldnt had been there you wouldnt have been living free...deshdrohi batein karte ho....very shamful....samjh nhi ati toe mat padho...par kavita ki bezzati mat karo,,,,silly....

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    4. nishu I think you need to know some information about the history as you are poor bab knowing nothing about the glory and bravery embedded in our past....Why you are even alive???? very shameful for you....if you dont understand thats fine...but foi this poem is the best example for excellence in the world of hindi literature for exemplifying the rich glory of Maharana Pratap and his special horse Chetak whose example is given for loyalty...I feel pity for you...as living in India you are unaware of these facts...you are not even loyal to your country,,,,infact..very shameful.....for....you!!

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    5. Itni bakwas comment mene life mein nahi pad hi...so full of hate

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    6. Bhai jo Ye comment likha us ke liye - bhai tu Paida kyun hua

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    7. hamare in mahan yodha ki wjah se hi hum aaj hindu..!!! agr ye nhi hote toh hum kabhi aajaad nhi ho pate..!!!!

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    8. Thank you shruti shrotriya for your comment..!!!!

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  3. chetak ke bina maharana partap adhure the

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  4. rana partap chetak bina adhure the

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  5. कौशल दिखलाया चालों में
    उड़ गया भयानक भालों में
    निर्भीक गया वो ढालों में
    सरपट दौड़ा करवालों में

    है यहीं रहा अब यहाँ नहीं
    है वहीँ रहा अब वहां नहीं
    थी जगह न कोई जहाँ नहीं
    किस अरि-मस्तक पर कहाँ नहीं

    इसके अलावा कुछ paragraphs बदलने होंगे

    ये sequence है

    1 - 3 - 5 - 4 - 6 - 7

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    1. dhad kahi pada sir kahi pada
      kuchh bhi unki pahchan nahi
      shronit ka aisa veg hua
      murde bah gaye nishan nahi
      mewad kesri dekh raha
      kewal ran ka n tamasha tha
      wah daud daud karta tha rann
      wah maan rakt ka pyasa tha
      ....

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    2. Can you please send me the full poem so that I can update

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  6. Great to learn that a veritable connoisseur of Hindi Poetry of Nishu's stature has commented on one of Shyam Narayan Pandey's contributions to Hindi Poetry, rated as one of the best in its quality of construction as well as content, with such impugnity.

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  7. I THINK IT IS STILL INCOMPLEAT.....I DONT REMEMBER D COMPLEATE POEM....BUT ANYWAYS THANKS FOR THIS MUCH..........ITS THE BEST POEM I HAVE EVER READ...........THANKU 4 THE POST.......

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    1. yes...it is incomplete....i remember some left lines....such as

      dhad kahi pada sir kahi pada
      kuchh bhi unki pahchan nahi
      shronit ka aisa veg hua
      murde bah gaye nishan nahi
      mewad kesari dekh raha
      kewal rann ka na tamasha tha
      wah daud daud karta tha rann
      wah maan rakt ka pyasa tha

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    2. Can you please send me the full poem so that I can update

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    3. Here is the some more excerpts of the poem..

      बकरों से बाघ लड़े¸
      भिड़ गये सिंह मृग–छौनों से।
      घोड़े गिर पड़े गिरे हाथी¸
      पैदल बिछ गये बिछौनों से।।1।।

      हाथी से हाथी जूझ पड़े¸
      भिड़ गये सवार सवारों से।
      घोड़ों पर घोड़े टूट पड़े¸
      तलवार लड़ी तलवारों से।।2।।

      हय–रूण्ड गिरे¸ गज–मुण्ड गिरे¸
      कट–कट अवनी पर शुण्ड गिरे।
      लड़ते–लड़ते अरि झुण्ड गिरे¸
      भू पर हय विकल बितुण्ड गिरे।।3।।

      क्षण महाप्रलय की बिजली सी¸
      तलवार हाथ की तड़प–तड़प।
      हय–गज–रथ–पैदल भगा भगा¸
      लेती थी बैरी वीर हड़प।।4।।

      क्षण पेट फट गया घोड़े का¸
      हो गया पतन कर कोड़े का।
      भू पर सातंक सवार गिरा¸
      क्षण पता न था हय–जोड़े का।।5।।

      चिंग्घाड़ भगा भय से हाथी¸
      लेकर अंकुश पिलवान गिरा।
      झटका लग गया¸ फटी झालर¸
      हौदा गिर गया¸ निशान गिरा।।6।।

      कोई नत–मुख बेजान गिरा¸
      करवट कोई उत्तान गिरा।
      रण–बीच अमित भीषणता से¸
      लड़ते–लड़ते बलवान गिरा।।7।।

      होती थी भीषण मार–काट¸
      अतिशय रण से छाया था भय।
      था हार–जीत का पता नहीं¸
      क्षण इधर विजय क्षण उधर विजय।।8
      कोई व्याकुल भर आह रहा¸
      कोई था विकल कराह रहा।
      लोहू से लथपथ लोथों पर¸
      कोई चिल्ला अल्लाह रहा।।9।।

      धड़ कहीं पड़ा¸ सिर कहीं पड़ा¸
      कुछ भी उनकी पहचान नहीं।
      शोणित का ऐसा वेग बढ़ा¸
      मुरदे बह गये निशान नहीं।।10।।

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  8. refresh the memories of our school days hindi poem book where the picture of maharana pratap holding a bhalla and riding chetak on the elephant trunk. It's just amazing to feeling your self back at the age of 11-12 years.

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  9. kuch adhoori hai shyad any way salute to rana and chetak=================

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  10. adhoori hai shyad any way salute to chetak and ranapratap

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  11. Really I am thrilled to go through this one of my favorite hindi poem. But it is still incomplete. Please if someone finds out, mail it to drnkrana@yahoo.co.in.
    Thanks to Avinash, Aman, Vikram Meena and others for their inputs.
    @ Vikram Meena: "Shonit ka aisa vaig badha, shav bah gaye nishan nahi". Shonit means 'blood'.

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  12. This hindi poem is available at link: http://geeta-kavita.com/hindi_sahitya.asp?id=170

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  13. Gadpari ke pawan paav pooj, Vadi pad ko kar namaskaar
    Us ambe ko us durga ko, Kali pad ko kar namaskar
    Us kaal koot pine wale ki nain yaad kar lal-lal
    Dag dag prahmand hila deta tha, Jiske tandav ka har ek taal-taal
    Chal pada veer chal padi sath, Jo kuch sena thi, laghu apar.

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  14. it's like re-living your own-self. There was also a complete poem on Jhansi ki rani, would appreciate if one could post that too

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  15. Nice poem but on time not to be follow .
    thankyou

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  16. rag rag me ufan bhar aaye
    chetak ki eaisi kahani thi
    vah sirf nahi ek ghoda tha
    rana pratap ne mani thi
    vah ek kadam bhi ruky nahi
    yudh ke meaidano me
    rana pratap befikar rahy
    ripuo ne dekha eisa sani

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  17. everybody thanks for the comments. I realize the poem is incomplete. Can someone please send me the full poem. Thanks

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  18. मेवाड़–केसरी देख रहा¸
    केवल रण का न तमाशा था।
    वह दौड़–दौड़ करता था रण¸
    वह मान–रक्त का प्यासा था।।11।।

    चढ़कर चेतक पर घूम–घूम
    करता मेना–रखवाली था।
    ले महा मृत्यु को साथ–साथ¸
    मानो प्रत्यक्ष कपाली था।।12।।

    रण–बीच चौकड़ी भर–भरकर
    चेतक बन गया निराला था।
    राणा प्रताप के घोड़े से¸
    पड़ गया हवा को पाला था।।13।।

    गिरता न कभी चेतक–तन पर¸
    राणा प्रताप का कोड़ा था।
    वह दोड़ रहा अरि–मस्तक पर¸
    या आसमान पर घोड़ा था।।14।।

    जो तनिक हवा से बाग हिली¸
    लेकर सवार उड़ जाता था।
    राणा की पुतली फिरी नहीं¸
    तब तक चेतक मुड़ जाता था।।15।।

    कौशल दिखलाया चालों में¸
    उड़ गया भयानक भालों में।
    निभीर्क गया वह ढालों में¸
    सरपट दौड़ा करवालों में।।16।।

    है यहीं रहा¸ अब यहां नहीं¸
    वह वहीं रहा है वहां नहीं।
    थी जगह न कोई जहां नहीं¸
    किस अरि–मस्तक पर कहां नहीं।।17।
    बढ़ते नद–सा वह लहर गया¸
    वह गया गया फिर ठहर गया।
    विकराल ब्रज–मय बादल–सा
    अरि की सेना पर घहर गया।।18।।

    भाला गिर गया¸ गिरा निषंग¸
    हय–टापों से खन गया अंग।
    वैरी–समाज रह गया दंग
    घोड़े का ऐसा देख रंग।।19।।

    चढ़ चेतक पर तलवार उठा
    रखता था भूतल–पानी को।
    राणा प्रताप सिर काट–काट
    करता था सफल जवानी को।।20।।

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  19. कलकल बहती थी रण–गंगा
    अरि–दल को डूब नहाने को।
    तलवार वीर की नाव बनी
    चटपट उस पार लगाने को।।21।।

    वैरी–दल को ललकार गिरी¸
    वह नागिन–सी फुफकार गिरी।
    था शोर मौत से बचो¸बचो¸
    तलवार गिरी¸ तलवार गिरी।।22।।

    पैदल से हय–दल गज–दल में
    छिप–छप करती वह विकल गई!
    क्षण कहां गई कुछ¸ पता न फिर¸
    देखो चमचम वह निकल गई।।23।।

    क्षण इधर गई¸ क्षण उधर गई¸
    क्षण चढ़ी बाढ़–सी उतर गई।
    था प्रलय¸ चमकती जिधर गई¸
    क्षण शोर हो गया किधर गई।।24।।

    क्या अजब विषैली नागिन थी¸
    जिसके डसने में लहर नहीं।
    उतरी तन से मिट गये वीर¸
    फैला शरीर में जहर नहीं।।25।।

    थी छुरी कहीं¸ तलवार कहीं¸
    वह बरछी–असि खरधार कहीं।
    वह आग कहीं अंगार कहीं¸
    बिजली थी कहीं कटार कहीं।।26।।

    लहराती थी सिर काट–काट¸
    बल खाती थी भू पाट–पाट।
    बिखराती अवयव बाट–बाट
    तनती थी लोहू चाट–चाट।।27।।

    सेना–नायक राणा के भी
    रण देख–देखकर चाह भरे।
    मेवाड़–सिपाही लड़ते थे
    दूने–तिगुने उत्साह भरे।।28।।

    क्षण मार दिया कर कोड़े से
    रण किया उतर कर घोड़े से।
    राणा रण–कौशल दिखा दिया
    चढ़ गया उतर कर घोड़े से।।29।।

    क्षण भीषण हलचल मचा–मचा
    राणा–कर की तलवार बढ़ी।
    था शोर रक्त पीने को यह
    रण–चण्डी जीभ पसार बढ़ी।।30।।

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  20. वह हाथी–दल पर टूट पड़ा¸
    मानो उस पर पवि छूट पड़ा।
    कट गई वेग से भू¸ ऐसा
    शोणित का नाला फूट पड़ा।।31।।

    जो साहस कर बढ़ता उसको
    केवल कटाक्ष से टोक दिया।
    जो वीर बना नभ–बीच फेंक¸
    बरछे पर उसको रोक दिया।।32।।

    क्षण उछल गया अरि घोड़े पर¸
    क्षण लड़ा सो गया घोड़े पर।
    वैरी–दल से लड़ते–लड़ते
    क्षण खड़ा हो गया घोड़े पर।।33।।

    क्षण भर में गिरते रूण्डों से
    मदमस्त गजों के झुण्डों से¸
    घोड़ों से विकल वितुण्डों से¸
    पट गई भूमि नर–मुण्डों से।।34।।

    ऐसा रण राणा करता था
    पर उसको था संतोष नहीं
    क्षण–क्षण आगे बढ़ता था वह
    पर कम होता था रोष नहीं।।35।।

    कहता था लड़ता मान कहां
    मैं कर लूं रक्त–स्नान कहां।
    जिस पर तय विजय हमारी है
    वह मुगलों का अभिमान कहां।।36।।

    भाला कहता था मान कहां¸
    घोड़ा कहता था मान कहां?
    राणा की लोहित आंखों से
    रव निकल रहा था मान कहां।।37।।

    लड़ता अकबर सुल्तान कहां¸
    वह कुल–कलंक है मान कहां?
    राणा कहता था बार–बार
    मैं करूं शत्रु–बलिदान कहां?।।38।।

    तब तक प्रताप ने देख लिया
    लड़ रहा मान था हाथी पर।
    अकबर का चंचल साभिमान
    उड़ता निशान था हाथी पर।।39।।

    वह विजय–मन्त्र था पढ़ा रहा¸
    अपने दल को था बढ़ा रहा।
    वह भीषण समर–भवानी को
    पग–पग पर बलि था चढ़ा रहा।।40।

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  21. फिर रक्त देह का उबल उठा
    जल उठा क्रोध की ज्वाला से।
    घोड़ा से कहा बढ़ो आगे¸
    बढ़ चलो कहा निज भाला से।।41।।

    हय–नस नस में बिजली दौड़ी¸
    राणा का घोड़ा लहर उठा।
    शत–शत बिजली की आग लिये
    वह प्रलय–मेघ–सा घहर उठा।।42।।

    क्षय अमिट रोग¸ वह राजरोग¸
    ज्वर सiन्नपात लकवा था वह।
    था शोर बचो घोड़ा–रण से
    कहता हय कौन¸ हवा था वह।।43।।

    तनकर भाला भी बोल उठा
    राणा मुझको विश्राम न दे।
    बैरी का मुझसे हृदय गोभ
    तू मुझे तनिक आराम न दे।।44।।

    खाकर अरि–मस्तक जीने दे¸
    बैरी–उर–माला सीने दे।
    मुझको शोणित की प्यास लगी
    बढ़ने दे¸ शोणित पीने दे।।45।।

    मुरदों का ढेर लगा दूं मैं¸
    अरि–सिंहासन थहरा दूं मैं।
    राणा मुझको आज्ञा दे दे
    शोणित सागर लहरा दूं मैं।।46।।

    रंचक राणा ने देर न की¸
    घोड़ा बढ़ आया हाथी पर।
    वैरी–दल का सिर काट–काट
    राणा चढ़ आया हाथी पर।।47।।

    गिरि की चोटी पर चढ़कर
    किरणों निहारती लाशें¸
    जिनमें कुछ तो मुरदे थे¸
    कुछ की चलती थी सांसें।।48।।

    वे देख–देख कर उनको
    मुरझाती जाती पल–पल।
    होता था स्वर्णिम नभ पर
    पक्षी–क्रन्दन का कल–कल।।49।।

    मुख छिपा लिया सूरज ने
    जब रोक न सका रूलाई।
    सावन की अन्धी रजनी
    वारिद–मिस रोती आई।।50।।

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  22. Thanks Raj Gurjar. I will update the poem.

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  23. Yar isme 47 ke baad kuch aur b hai,....pura yad nhi par...
    Kuch is trh hai....
    Fir agle dono pairo ko ari mstak par tha gada diya,........
    Aur kuch ye b aata hai...
    Bhale ki halki hawa lagi
    Pilwan gira tan chut gya......

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  24. चलो चले एक काम करे' सुबह उठते ही धरती मॉ को प्रणाम करे...

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  25. Is poem ki burai karne walon; tum gaddar ho; maharana pratap aur chetak jaise veeron ki insult krne walon koi haq nhi hai is desh mein rehne ka

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  26. Is poem ko bakwas kehne wale nishu; simran; garvita; tum log gaddar ho jo maharana pratap aur chetak jaise veeron ka insult krte ho. Tum log India mein rehne layak nhi ho

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  27. behetareen poem!! hate who abuse this poem

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  28. Thanks Lot for posting this poem. I was searching for this since years...
    I had studied few para at school in village all memory got refresh...

    Thanks again

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