Thursday, October 21, 2010

हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के (Hum Panchhi Unmukt Gagan Ke) - शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ (Shivmangal Singh 'Suman')

हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाऍंगे,
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाऍंगे।

हम बहता जल पीनेवाले
मर जाऍंगे भूखे-प्‍यासे,
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से,

स्‍वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले,
बस सपनों में देख रहे हैं
तरू की फुनगी पर के झूले।

ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने,
लाल किरण-सी चोंचखोल
चुगते तारक-अनार के दाने।

होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी,
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती सॉंसों की डोरी।

नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्‍न-भिन्‍न कर डालो,
लेकिन पंख दिए हैं, तो
आकुल उड़ान में विघ्‍न न डालों।

12 comments:

  1. @ Ana - ब्लॉग पर आपका स्वागत है और टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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  2. इस कविता का भाषांतर आप को निम्नलिखित लिंक पर लब्ध होगा। आशा है आप को पसंद आये।

    http://cpravikumar-hindi.blogspot.in/2013/05/we-are-birds-of-open-skies.html

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  3. bahut achhi kavita hai.hamare school mei hamere books me bhi yahi kavita likhi hui hai.hamari mam ne hume task diya hai ki hame iss poori poem ko yaad karke lana hai

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  4. Bhaut sunder shabdo m khi h hum punchi unmuket gag an k@

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  5. maine ye poem school me yaad kiya tha...mujhe bahut acchi lagti hai.

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