Friday, January 14, 2011

मोको कहां ढूँढे रे बन्दे (Moko Kahan Dhoondho Re Bande) - कबीर (Kabir)

मोको कहां ढूँढे रे बन्दे
मैं तो तेरे पास में

ना तीरथ मे ना मूरत में
ना एकान्त निवास में
ना मंदिर में ना मस्जिद में
ना काबे कैलास में
मैं तो तेरे पास में बन्दे
मैं तो तेरे पास में

ना मैं जप में ना मैं तप में
ना मैं बरत उपास में
ना मैं किरिया करम में रहता
नहिं जोग सन्यास में
नहिं प्राण में नहिं पिंड में
ना ब्रह्याण्ड आकाश में
ना मैं प्रकुति प्रवार गुफा में
नहिं स्वांसों की स्वांस में

खोजि होए तुरत मिल जाउं
इक पल की तालास में
कहत कबीर सुनो भई साधो
मैं तो हूं विश्वास में

6 comments:

  1. Thanks to you to for visiting and commenting. Please suggest other poems.

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  2. कबीर जी के दोहों का अर्थ बहुत गहरा और मन को छूने वाला
    आज की युवा पीडी क्या समझे
    धनवाद

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  3. kabir's work is ageless,generationless,wonderful. Avinash ji aap ki kavitaon ka sangrah dekh kar lagta hai aap khud bhi kavita zaroor likhte honge,unhe bhi post karein,mein bhi thoda bahut likh leta hoon agar padhna chahe to http://www.cifarshayar.blogspot.in par ja sakte hain.

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